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उत्तराखण्ड सरकार की माफियापरस्ती और भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा

गंगाजी से 05 किलोमीटर की दूरी तक स्टोन क्रेशरों के संचालन पर लगी रोक को हटाने के पीछे भारी लेन-देन हुई है। माननीय उच्च न्यायालय नैनीताल ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा है कि केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड, दिल्ली (सी0पी0सी0बी0) का आदेश यथावात/प्रभावी है और किसी को इससे कोई दिक्कत हो तो वह उसे उचित फोरम पर चुनौती दे सकता है। इसके बावजूद सी0पी0सी0बी0 के निर्देश की अवमानना सीधा-सीधा देश की संवैधानिक व्यवस्था पर आघात है। ये अराजकता का जीताजागता प्रमाण है। उत्तराखण्ड में श्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत जी की सरकार गैर-कानूनी कार्यों को करने में भ्रष्टाचार की हर सीमा पार करती जा रही है। यह सब एक बहुत ही बड़े षडयन्त्र के तहत किया जा रहा है। मातृ सदन गंगाजी के दोहन-शोषण-उत्पीड़न को बर्दाश्त नहीं करेगी। उत्तराखण्ड सरकार के इस गैर-संवैधानिक कार्य के विरुद्ध सम्बन्धित/दोषी अधिकारियों के विरुद्ध सक्षम न्यायालय में फौजदारी मुकदमा दर्ज कराकर उनको दण्डित करवाया जायेगा, माननीय उच्च न्यायालय में अवमानना याचिका दायर की जायेगी और गंगाजी के रक्षार्थ पुनः तपस्या प्रारम्भ की जायेगी, जिसकी घोषणा परमादरणीय श्री गुरुदव जी का ध्यान-साधना से आज रात में उठने के बाद होगी। उत्तराखण्ड सरकार अपने भ्रष्टाचार और गैर-कानूनी कार्यों को छिपाने के लिये मातृ सदन के संतों, विशेषकर परमादरणीय श्री गुरुदेव जी की हत्या को उतारु है। पिछले बार भी इन्होंने श्री गुरुदेव जी की हत्या का पूरा प्रयास किया था और इस बार भी ऐसा ही करेंगे इसमें कोई दो राय नहीं है। मातृ सदन गंगाजी के रक्षार्थ सर्वस्वत्याग को तैयार रही है और रहेगी। सरकार का यह कृत्य गाय, गंगा और गीता के नाम पर सत्ता हासिल करने के बाद अनाचार, अत्याचार, साधुद्रोही, धर्मद्रोही, झूठ और पाखण्ड का पोल खोल रही है।

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समाज की दुर्दशा का कारण


आजकल कुछ तथाकथित सन्तों को लेकर समाज में नाना प्रकार की समालोचनायें हो रही हैं। यहाँ प्रश्न उठता है कि सन्त किसे कहें? जो व्यक्ति सांसारिक जीवन के समस्त सुखों में लिप्त हो, त्याग, वैराग्य एवं ब्रह्मचर्य नाम की जहाँ चर्चा तक न हो, पुत्रैषणा, वित्तैषणा, लोकैषणा, इन एषणा त्रिकुटी के बीच ही फँसा हो उसे सन्त कह देना और उसका दुष्परिणाम आने पर सन्त को कोसना कहाँ की बुद्धिमानी है?
जीवन को समझने के लिये कर्म, धर्म और अध्यात्म को भली-भाँति समझ लेना होगा। जब शुद्ध कर्म का सेवन किया जाता है तो अन्तःकरण की शुद्धि शुरु होती है। इससे धर्मयुक्त कर्म होगा। धर्म क्या है इसे शास्त्र से समझना होगा। मनुस्मृति में धर्म की यह परिभाषा है:-
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्।।
मनुस्मृतिः 6/92
अर्थात्- धैर्य, क्षमा, विकार का हेतु उपस्थित होने पर भी मन का अविकार, परधन का अग्रहण, इन्द्रियों का नियन्त्रण, शास्त्रार्थ का ज्ञान, आत्मज्ञान, यथार्थ वचन, क्रोध का त्याग, यह दश प्रकारों से युक्त सर्वाश्रमसाधारण धर्म का रूप है।
पुनः याज्ञवल्क्य स्मृति में धर्म का लक्षण इस प्रकार कहा गया हैः-
अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
दानं दमो दया शान्तिः सर्वेषां धर्मसाधनम्।।
अर्थात्: अहिंसा, सत्य, चोरी न करना (अस्तेय), शौच (स्वच्छता), इन्द्रिय-निग्रह (इन्द्रियों को वश में रखना), दान, संयम (दम), दया एवं शान्ति।
अब जब धर्म का सही रूप से पालन करते हुए जो कर्म किया जाता है वह कर्म अपने परिपाक के समय निष्काम हो जाता है। यह निष्काम कर्म अन्तःकरण को शुद्ध करने में समर्थ होता है। उसके बाद शुद्ध अन्तःकरण वाला व्यक्ति अपने भीतर की पुत्रैषणा, वित्तैषणा व लोकैषणा का त्याग कर अपने भीतर अपनी आत्मा के अन्वेषण में तत्पर होता है। शास्त्र व वेदान्त के सही मर्म को (गुरू के द्वारा) समझकर उसका अपने अन्दर ध्यान की उच्चतम अवस्था में साक्षात्कार करता है, इसके लिये उसे घोर तप के माध्यम से गुजरना पड़ता है। इस तरह वह अपनी साधना के सामर्थ्य से किसी देव विशेष में अनुरक्त होकर जीवन पर्यन्त उपासना में रत रहता है या फिर ध्यान की परमावस्था में औपनैषदिक घोषणा के अनुरूप यह आत्मा ही ब्रह्म है इसका अपरोक्षानुभूति कर तदनुकूल हर क्षण यह अनुभव करते हुए कि यह आत्मा ही ब्रह्म है, अपने प्रारब्ध कर्म का भोग कर जीवन समाप्त होने के बाद ब्रह्म में लय कर जाता है। ऐसा ही व्यक्ति अपने प्रारब्ध क्षय के समय प्रत्येक जीव को अपनी आत्मा समझता हुआ संसार में वर्त्तता है तो अनेक जिज्ञासु उसके पास आते हैं और उन्हें ज्ञानामृत से तृप्त कर उसका पथ प्रदर्शन करता है। उसे ही सन्त कहते हैं।
तब प्रश्न उठता है कि समाज में ऐसे लोग, जो सांसारिक प्रपंच में लिप्त हैं, उनके पास यह भीड़ क्यों देखी जाती है? वहाँ जाकर लोग ठगाता है फिर भी लोग उनके पीछे क्यों पड़े रहते हैं? इसका सीधा सा उत्तर है कि जब मनुष्य कर्म से दूषित होगा तो उसकी भावना भी दूषित होगी। आज समाज ने धन को ही सर्वस्व समझ लिया है। किसी भी तरह से धन अर्जन करने की लिप्सा ही उसे ऐसी जगह आकृष्ट करती है। आज तथाकथित सन्त व्यापारी हैं, वह मन्त्री आदि बनते हैं और घोर संसार में आसक्त व्यक्तियों के समक्ष नतमस्तक होकर राजनीतिक पद पर बैठने के लिये लालायित रहते हैं। उनके अनुयायी भी उनके पास अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिये नहीं वरण अपनी सांसारिक कामनाओं की पूर्ति के लिये ही जाते हैं। इनके विषय में Birds of the same feather flock together की परिभाषा ही चरितार्थ होती है। विज्ञान का एक मान्य सिद्धान्त है कि like dissolves like, समान गुणवाला ही समान गुणवाले से मिलता है।
अतः समाज जब पुरूषार्थ चतुष्टय के धर्मरूप आधार को त्याग दे तथा मोक्षरूप फल खाने से मुँह फेर ले तो उसे उस अर्थ और काम के बन्धन में बँध कर ही समस्त कार्य करना होगा। उसका परिणाम भी सामने है और होगा।
हठयोग के कुछ आसन जो यम-नियम के बाद जिसमें ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (संग्रह का अभाव) मुख्य है, में कुछ व्यायाम को मिलाकर राजयोग के नाम पर व्यवसाय चलता हो, यहाँ याद रखना होगा कि यह हठयोग जो मुख्यतः अनेक जानवरों के बैठने, विचरने व अन्य क्रियाकलापों पर आधारित है, बिना ब्रह्मचर्य के व्रत का अनुष्ठान कर किया जायेगा तो संसार में पाशविक वृत्ति ही फैलायेगा । इन सूक्ष्म तरंगों से सामाजिक तानाबाना व्याप्त रहेगा। यह प्रजापति के द्वारा विरोचन को दिया गया उपदेश है। वह होगा और हो भी रहा है।
यहाँ यह स्मरणीय है कि सती-साध्वी सीता जब घोर अरण्य में मृग में हिरण्य देखती है तो विवेक रूपी राम और वैराग्य रूपी लक्ष्मण से विहीन होकर सन्यासी के वेष में रावण द्वारा अपहृत होती है। यह त्रेता की घटना है और अभी कलियुग है। ऐसी स्थति में जब संसार में सर्वत्र वासना की प्रबल धारा बह रही हो तो उसमें तिनके का बह जाना स्वाभाविक ही है।
आजकल धर्म के आधार और मोक्ष के प्रतिफल से रहित अर्थ और काम के प्रवाह में किस संस्था के अधिकांश लोग नहीं बह रहे हैं? यह विचारणीय है कि समाज को इससे कैसे बचाया जाये|

कुछ वीडियो आश्रम में प्रशासन की संवेदनहीन और राक्षसी कार्यवाही के…

Being warned against forceful entry into the Ashram by Br Dayanand & Dr Vijay Verma

<a href="http://“>श्री गुरुदेव के कक्ष के बाहर पुलिस द्वारा बलपूर्वक हटाये गए आश्रम के संत एवं भक्त

<a href="http://“>श्री गुरुदेव के बरामदे की ग्रिल काटते हुए

https://www.youtube.com/watch?v=thnommOs7oY video link of ‘Satyagrah’ documentary film produced by Lisa Sabina Harney, was adjudged world best documentary in International Film Festival 2013

खनन बंद होने के कारण श्री गुरुदेव ने जल ग्रहण किया

आज प्रेस को संबोधित करते हुए श्री गुरुदेव जी ने कहा कि चूँकि खनन बंद किया गया है इसलिए मैंने केवल जल लेना शुरू किया है, लेकिन चूँकि ये खनन बंदी बरसात के चलते हुई है इसलिए हमारी तपस्या अनवरत जारी रहेगी| शासन प्रशासन की तरफ से कोई लिखित सूचना नहीं दी गई है, लेकिन हमने अपने स्रोत से पता लगाया है कि खनन बंद है इसलिए मैं अपने सिद्धान्त के तहत जल लेना शुरु किया हूँ| हमारी तपस्या जारी रहेगी और ये तब तक जारी रहेगी जब तक कि लिखित में नहीं आएगा कि रायवाला से भोगपुर के बीच गंगा में हमेशा के लिए खनन पूर्ण रूप से खनन बंद दिया गया है और दोषी अधिकारियों के विरुद्ध कार्यवाही नहीं की जाती हैं|
रविवार (28 May 2017) को श्री गुरुदेव जी के पवित्र कक्ष का मुख्य दरवाजा को काटने लगे जिससे श्री गुरुदेव जी के पवित्र कक्ष धुआं से भर गया और कमरे में मौजूद श्री गुरुदेव और उनके दो शिष्यों के गले और फेफड़े में धुआं भर गया जिसका परिणाम है कि श्री गुरुदेव जी के गले में जख्म हो गये है और जल लेने में परेशानी हो रही है।

वीडियो लिंक
श्री गुरुदेव की प्रेस वार्ता दिनांक १ जून २०१७

श्री गुरुदेव जल ग्रहण करते हुए
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आश्रम में प्रशासन का बलपूर्वक प्रवेश

रविवार (28 May 2017) की संध्या पांच बजे हरिद्वार जिला प्रशासन के लोग भारी पुलिस बल साथ लेकर आश्रम में आये और ईंधन वाला कटर लेकर श्री गुरुदेव जी के पवित्र कक्ष का ग्रिल काटकर मुख्य दरवाज़ा से पहले मच्छरजाली दरवाज़ा को काटकर मुख्य दरवाजा को काटने लगे जिससे श्री गुरुदेव जी का पवित्र कक्ष धुआं से भर गया और श्री गुरुदेव सहित दो संतों का अंदर दम घुटने लगा, इसकी सूचना मौके पर मौजूद SDM हरिद्वार को दी गई उसके बाद भी वे लोग ऐसा करने से नहीं रुके, हत्या का प्रयास किया गया, मौका पर मौजूद थानाध्यक्ष कनखल को लिखित तहरीर दी पर वे रिसीव नहीं किये।
उनका इरादा श्री गुरुदेव की जीवन रक्षा की आड़ में गुरुदेव को फ़ोर्स फीड करने के लिए अस्पताल ले जाना था और जिस प्रकार स्वामी निगमानंद की हत्या की थी उसी प्रकार वे गुरुदेव की भी हत्या करना चाहते थे|
श्री गुरुदेव की तपस्या जारी है और आज (31 May 2017) उनकी तपस्या का आठवां दिवस है| जल के परित्याग का छठवां दिन

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मेन गेट के बाहर भारी पुलिस फ़ोर्स
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पुलिसकर्मी ग्रिल काटने को तैयार
कटर से ग्रिल काटते हुए
श्री गुरुदेव के कक्ष के बरामदे में
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श्री गुरुदेव के कक्ष के बाहर
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श्री गुरुदेव की तपस्या का 8वां और जल परित्याग का 6वां दिन