योग

ऊँ ऽ ऽ ऽ
पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
ऊँ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।।
इससे पहले हमलोग बहुत से विषयों पर चर्चा कर चुके हैं। हमारा आज का जो विषय है थोड़ा गूढ़ है। क्योंकि जब मनुष्य धीरे-धीरे यह समझ जायेगा कि हमारा आगमन यहाँ क्यों हुआ है? हमारा कर्म क्या होना चाहिये ? मरने के बाद हमारा क्या गन्तव्य स्थान होना चाहिये? तब वह सोचेगा, अपने अन्दर में टटोलेगा। वह चाहते हुए भी कोई एकाएक यह चाह ले कि हम सीधा स्वर्ग में चले जाएँ तो उससे होने वाला नहीं है। क्योंकि मनुष्य में जानवर का एक गुण instinct (स्वतः प्रवृति) होता है। जैसे कोई सिगरेट पीता है, कोई शराब पी रहा है, तो जब उसका वह अभ्यस्त हो जाता है, तो मात्र उसके चाहने भर से वह सिगरेट को छोड़ नहीं सकता है, वह शराब को छोड़ नहीं सकता है, क्योकि अब उसका instinct (स्वतः प्रवृति) जो है, उसकी वह भावना जो है, वह उसको जकड़ लेती है। और उस समय मात्र इच्छाशक्ति काम नहीं करेगी। यह जो उसके मन में सद्विचार उठेगा, वह सद्विचार मात्र से ही उसकी आदत नहीं बदलेगी। जब वह विचार में स्थित हो जाएगा, उसका वह विचार योग के द्वारा ही स्थित होगा और उसकी बुरी आदतें नष्ट हो जाएँगी। ऐसी बात की यदि उसने इच्छा की तो मात्र इच्छा से ही नहीं होगा। जैसे श्रुति कहती है किः-

द्यावा पृथ्वी अन्तरिक्षम्।

जब हमें सत्सङ्ग, तीर्थाटन, निष्काम कर्म आदि करके अपने अंतःकरण की शुद्धिकरण से सत्य को प्राप्त करने की इच्छा होती है तब यह जो द्यावा स्वर्ग की बातें हैं, इसे पृथ्वी माने अपने भीतर स्थापित करने के लिये अन्तरिक्ष का शुद्धिकरण नितान्त आवश्यक होता है। और यह जो एक तरीका है कि हमारे शुभ विचार हमारे अन्दर में प्रतिष्ठित हो जायँ। इस विचार की जो प्रक्रिया है वह ‘योग’ है। योग का मतलब ही होता है, एक को दूसरे से मिलाना। अब इस योग की प्रक्रिया को जानने के लिये एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता होती है कि जो, उस प्रक्रिया को कर चुका हो। जो इस प्रक्रिया को जानता हो। जैसे कोई शिक्षक विद्यार्थी की गलतियों, कमजोरियों को समझते हुए उसे कैसे दूर किया जाता है, उसे जानता है, वैसे ही एक योगस्थ गुरु जो होते हैं, वह अपने पास आये व्यक्तियो का या जो उसमें समर्पित हो जाता है, उसके दोषों को कैसे दूर किया जाय, यह जानता है। जैसे कोई बिजली का मिस्त्री है और कहीं बिजली खराब हो गई है और वहाँ से यहाँ तक लाइन की टेस्टर से जाँच कर, पुनः उसे जोड़कर विद्यृत् प्रवाह चालित करता है। तो उसी प्रकार जो योगस्थ गुरु होते हैं, वह शिष्यों को अपने पास रख कर के वह जो पहले ही मैंने कहा कि पूर्णमदः पूर्णमिदं तो इस दोनों के बीच में हमारे भीतर जो बह्मतत्त्व था, हम जो उससे अलग हो गये, यह कहाँ लाइन कटी हुई है इसका उसे ज्ञान हो जाता है। और उसी बिन्दु पर ही उसे वह जोड़ता है। इसलिये जो ब्रह्मर्षि होते हैं, जो योगस्थ होतेै हैं, वह जानते हैं कि किस शिष्य को कौन सा मन्त्र देंगे, उसकी कौन सी प्रक्रिया होगी, जिसे करने से वह माया से छूट जायेगा। जब तक मनुष्य यह नहीं जानता है, तबतक उसे उस तत्त्व की प्राप्ति होना सर्वथा दूभर है।

इसलिये आज का जो मेरा विषय है वह विषय है योग। योग का विषय तो बहुत गहन है। और इतने दिन तक केवल हम बहिर्गत रूप को ही लेते गये कि कैसे मनुष्य को रहना चाहिये? कैसे जीवन जीना चाहिये? क्या तीर्थ है? इसलिये आज मैं कुछ भीतर की बात समझाना चाहता हूँ कि योग क्या है? और इसको कैसे किया जाये? वेद का मन्त्र है और इस मन्त्र का यदि हम बहिर्गत अर्थ लेंगे, तो बड़ा ऊटपटांग सा लगता है। लेकिन है तो जरा वह गूढ़ पर यदि हम स्थूल रूप में भी आपलोगों को समझा देंगे तो समझ जायेंगे और जब योग करने की इच्छा होगी तो यह मन्त्र उस समय बहुत काम देगा। मन्त्र है:-

चत्वारि श्रृङ्गा त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य।
त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मर्त्याँ   2 आविवेश।।

इस मन्त्र में एक ऐसे बैल की कल्पना की गई है कि चत्वारि श्रृङ्गा, जिसका चार सींग है, त्रयो अस्य पादा, उसके तीन पाँव हैं, द्वे शीर्षे, दो सिर हैं, सप्तहस्तासो, सात हाथ हैं, त्रिधा बद्धो, यह ऐसा जो वृषभ है जो तीन जगह से बँधा हुआ है और वह जब गान करता है तो बहुत जोर से आवाज करते हुए गमन करता है। लेकिन वह मृत्यृ को शमन करने वाला होता है। मृत्यु को नष्ट करने वाला होता है। ऐसे ही वृषभ की कल्पना की गयी है। इसे पूर्ण योगशास्त्र पर ही समझा जा सकता है। जब हम योग करेंगे, हम अपने अन्दर में प्रवेश करेंगे, और वह गुरु जो उस तत्त्व को जानने वाले होते हैं, वह ऐसी क्रिया देते हैं जिसके द्वारा वह भीतर प्रवेश करे और जब हम भीतर देखते हैं तो मूलाधार तत्त्व में जब वह जाता है तो उसके चार पद्म हैं।

इसलिये कहते हैं कि चत्वारि श्रृङ्गा त्रयो अस्य पादा, पाँव से लोग चलता है तो यह तीन पाँव कौन सा है? तो जो योगी होते हैं, वह प्राणिक क्रिया करते हैं। और प्राण की जो सबसे प्रचलित क्रिया है वह हमारा श्वास-प्रश्वास की क्रिया है, श्वास-प्रश्वास की क्रिया को अब जाना जाता है। इड़ा पिंगला की क्रिया करते करते वह सुषुम्णा में प्रवेश करता है। उसके भीतर से चलता है वही उसका त्रयो अस्य पादा, उसके ये तीन पाँव हैं। द्वे शीर्षे उसका यहाँ पर आज्ञा चक्र में जो दो पद्म है वही उसके दो शीर्ष हैं। सप्तहस्तासो अस्य और उसके सात हाथ कौन-कौन से हैं? हाथ से भक्षण करता है, हाथ से वह भोजन करता है तो उसके सात हाथ हमारे अन्दर में सात चक्र हैं जिसे योगी देखते हैं। वह है मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा और सहस्राधार। यही उसके सात हाथ हैं। त्रिधा बद्धो – यह क्रिया मन्त्र (वाक), मन और प्राण के साथ की जाती है। यही तीन जगह से बँधा हुआ है और ये क्रिया जब की जाती है तो बहुत जोरों की आवाज होती है। उसमें से ओंकार ध्वनि निकलती है कि भैया जो इस बैल पर सवार हो गया है तो उसे मृत्यु स्पर्श नहीं कर सकता है किन्तु यदि वह अपनी इच्छा से मृत्यु को वरण करे तो यह अलग बात है, परन्तु मृत्यु नहीं उसे कुछ कर सकता है।

यह इसलिये पहले ही मैंने कहा कि योग की कुछ बातें बताने से पूर्व कि यह वेद की वाणी है और इस मन्त्र की वाणी में जो वेद के निन्दक हैं, वह बहुत ही ऐसी निन्दा किया करते हैं, कि कहाँ से ऐसा बैल होगा, कौन ऐसा बैल है, जिसका तीन पाँव होगा, चार सींग होगा। तो यह जिसे ज्ञान नहीं होगा उसके लिये ज्ञान के अभाव में सत्य को समझना बहुत कठिन होता है। तो इस ढंग से जब हम योगस्थ होंगे, अपने अन्दर प्रवेश करेंगे, तो जैसे हम बाहर में बैठे हुए हैं तो यदि हमारी आँख ठीक रहती है तो हम बाहर की वस्तुओं को भी देखते हैं। जब अन्तर्चक्षु खुलता है उससे अन्दर की वस्तु प्रदर्शित होती है। तो इतने दिन तक मैं जिन बातों की व्याख्या कर रहा था, वह उसका बहिर्गत रूप था।

उसके आन्तर रूप में प्रवेश करने के लिये योग करना नितान्त आवश्यक है। और चूँकि हमलोग तीर्थ में हैं, तीर्थस्थल है, और तीर्थ का माने ही होता है तृ प्लवनसंतरणयोः धातु से औणादिक थक् प्रत्यय लगकर तीर्थ शब्द बना है। तरन्ति येन यत्र वा तत् तीर्थम। अर्थात् जिसके द्वारा या जहाँ संसार सागर को पार करता है वह तीर्थ है। जो किनारे में हो, यानि हम ये मान के ही चलते हैं कि हम तीर्थ में आये हैं। हम ये सोच ही लिये हैं कि जो संसाररूपी जगह है, उसके ठीक किनारे में हम आ गये हैं, बीच में एक नौका की आवश्यकता है, जिस नौका से हम उस पार चले जायें। क्योंकि जब धर्म का उदय होता है मनुष्य में, धर्म की जब प्रवृत्ति जगती है, तो तीर्थाटन जो है वह पहली सीढ़ी है। जब हम तीर्थाटन शुरू करेंगे, तो तीर्थ के विषय में कहा गया हैः-

उत्तमा सहजाऽवस्था मध्यमा ध्यानधारणा।
मूर्तिपूजाऽधमा तत्र तीर्थयात्राऽधमाऽधमा।।

यानि क्रमशः बताया गया है, तीर्थयात्रा से जो निम्नत्तम अवस्था होती है, वहाँ से हम शुरू करेंगे और तीर्थ में पापों का क्षय होता है। तो उस पाप का क्षय करते-करते हमें देवता के अस्तित्व में आशा जगेगी, और उसको हम मूर्तिमान् रूप में देखेंगे। अब उसके बाद ध्यान, धारणा और योग की प्रवृत्ति बैठेगी। अन्दर में योग क्या है? उसका ज्ञान होगा। और जब हम ध्यान और धारणा करने लगेंगे तो, सहज अवस्था में आयेंगे। तब उठते, बैठते, खाते, पीते, चलते सहज अपने स्वरूप में स्थित होंगे और उससे कभी हमारा व्यतिक्रम नहीं होगा। यह तपःस्थली है। तो तीर्थाटन जब आप शुरु किये है तो मैं मान के चलूँगा कि इस सीढ़ी से आप दूसरी सीढ़ी में जायेंगे, फिर दूसरी से तीसरी में और तीसरी से चैथी में और आप अपने स्वरूप को पाने में अग्रसर हो गये हैं, इसलिये आज मैंने योग का विषय चुना। ब्रह्मतत्त्व बहुत सरल है। हमारी अपनी आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना दुनियाँ में सबसे सरल है। लेकिन वह जो नहीं हो पा रहा है उसका कारण अज्ञान है, अज्ञान से निवृत्ति हो जाने पर जब ज्ञान हो जाता है, तो अपनी आत्मा की प्रतिष्ठा हो जाती है।

आज मैं थोड़ा सा पातञ्जल योग सूत्र का जो अष्टाङ्ग योग सूत्र है उसका थोड़ा सा विवरण दे दूँ और बीच-बीच में यदि समय मिलेगा तो कोई प्रश्न करेंगे तो उस प्रश्न का मैं उत्तर देने की चेष्टा करूँगा। इससे तो समझ गये कि योग की क्यों आवश्यकता है? कहा गया है, श्रुति कहती हैः-

यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत् परम्।
अभयं तितीर्शितां पारं नाचिकेतं शकेमहि।।

जैसे प्राणिक क्रियायें हैं, यौगिक क्रिया है, यह एक सेतु का काम करता है। जैसे हम लोग नदी के इस पार से उस पार जाने के लिये पुल बना लिये हैं, ठीक उसी हिसाब से प्राणिक क्रिया के द्वारा हम इस पार से उस पार होकर अक्षर ब्रह्म में प्रतिष्ठित होंगे। तो अब प्रश्न उठता है कि अष्टाङ्ग योग है क्या? अब अष्टाङ्ग योग का मैं संक्षिप्त विवरण दे रहा हूँ। इसके आठ  अङ्ग है, इसलिये इसका नाम अष्टाङ्ग योग है।

ये हैं यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, घ्यान और समाधि। यम, नियम, आसन और प्राणायाम बहिर्गत रूप हैं और उसके बाद प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि इसके अन्तर्गतरूप हैं। पातञ्जल योग सूत्र मेें यम पाँच प्रकार के बतलाये गये हैं। वह है अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह। इस पाँच यम का पालन करने पर उसे अन्दर जाने की प्रक्रिया, रास्ता प्रशस्त होता है। दूसरा है नियम, इसके अन्तर्गत शौच, सन्तोष, स्वाध्याय, तप और ईश्वर प्रणिधान आते हैं। तीसरा आता है आसन, आसन कहते हैं बैठने को। इसमें योगी को पहले आसन सिद्ध होना नितान्त आवश्यक होता है। आसन में एक चीज की आवश्यकता है कि जब भी मनुष्य बैठे तो सीधा बैठे। जब साधक लगातार एक साथ तीन घण्टा एक आसन पर बैठ जायेगा तब आसन सिद्ध कहलाता है। और इसी को आसन सिद्ध कहते हैं। जब ये तीन चीज मनुष्य स्वतः करने लगता है, अपने प्रयत्न से करेगा और इस तीन के प्रयत्न में मनुष्य को स्वतः अपना ही मदद चाहिये। तब बात आयेगी प्राणायाम की। मैं अभी कह रहा था कि बिना प्राण के ऊर्ध्वगमन हुए, योग साधना में प्रवेश नहीं हो सकता है। प्राण आ याम। या गतौ धातु है, या माने जाना। आ माने अन्तिम सीमा तक। योगी प्राण को अपनी इच्छानुसार अन्तिम सीमा तक ले जाने में सक्षम होते हैं। इसकी जो क्रियाएँ हैं, इसकी जो विधि है, इसका जो तरीका है, वह जब मनुष्य अपनाता है, तब वह प्राणायम में प्रतिष्ठित होता है। तब वह प्राणायाम को जानने वाला होता है। जब प्राण वश में हो जायेगा तो, प्राण वश में हो जाने के बाद आता है प्रत्याहार। इसकी सही व्याख्या तो यही है ‘प्रति आहार’। प्रति माने प्रत्येक, आहार माने भक्षण। मैंने आपको बताया थाः-

चत्वारि श्रृङ्गा त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य।

यानि सातों हाथों के द्वारा भक्षण, यानि प्रत्येक चक्र में उस प्राण को संयमित करना अर्थात् प्राण को भक्षण करना। जब प्रत्येक में प्राण का भक्षण होगा तब आती है धारणा। धृ कहते हैं धारण करने को। और अन भी प्राण ही है। अन से ही प्राण बना है तो जब उस अन को, बुद्धि को और प्राण को एकीभूत करके रखेंगे, तो प्राणः प्राणे………….। प्राण जब प्राण के साथ और मन जब मन के साथ तब वह धारणा कहलाता है। जब उस प्राण को धारण करने की शक्ति हो जाये तो उसको धारणा कहते हैं। उसी का हुआ ध्यान। धी कहते हैं बुद्धि को, अन कहते हैं प्राण को। जब प्राण और बुद्धि एकीभूत होकर स्थिर रहेगा, तो ध्यान होगा।

उसके बाद सम अधि यानि समान रूप से वह प्रत्येक चक्र में वास करते हुए गमन करता है तो वही समाधि होती है। समाधि की दो अवस्था होती है सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात। सम्यक् रूप से प्रकृष्ट रूप से हमें ज्ञात होता रहेगा कि हम कहीं जा रहे हैं। लेकिन जब यह ज्ञान ही उस आत्मतत्त्व में लय कर जायेगा, उस ब्रह्मतत्त्व में लय कर जायेगा, और वहाँ एक केवल कैवल्य ही रहेगा, मैं मैं ही रह जायेगा। तो यह असम्प्रज्ञात समाधि है। यह मैं आप लोगों को छोटे में जो योग का पातञ्जल योग सूत्र है उसे यौगिक व्याख्या करते हुए बताया। यह विषय बहुत गहन है, यह क्रिया भी बहुत गहन है। और इस क्रिया को ठीक ढंग से करने लिये जरूरी है कि इसका ज्ञान हो।

इसी प्राणोपासना पर मातृ सदन से एक पत्रिका (*) निकलती है जिसमें स्थायी स्तम्भ के रूप में एक प्राणोपासना स्तम्भ निकल रहा है। जो वेद में कहाँ-कहाँ इस यौगिक रूप से प्राण को प्राणिक क्रिया किस ढंग से बतायी गयी है? और कैसे इसे योगी करते हैं? यह इसी last (अन्तिम) अङ्क में नहीं आया है, इसमें हम लोग सत्याग्रह इत्यादि का ही विशेषाङ्क दिये हैं लेकिन पूरी पूरी यह एक हमारा स्थायी स्तम्भ है जो कि बहुत दिनों से निकल रहा है उसमें ये स्पष्ट हो जायेगा। स्पष्ट बात है, यदि हम योग का आश्रय नहीं लेते हैं तो सर्वथा मुश्किल है कि हमें उस परमतत्त्व की थोड़ी सी भी प्राप्ति हो। लोगों ने ऐसे व्यक्तियों को भी देखा है, जिन्होंने ये कहा कि एक करोड़ बार कागज पर राम राम लिखे हैं, तो मैने उनसे ये पूछा कि भेया ये बताओ, सच सच बताना कि क्या तुम्हें स्वप्न में भी कभी राम का दर्षन हुआ है। तो वह कहता है कि नहीं हुआ। सही अर्थ में योगस्थ होकर के यदि एक बार भी राम को पुकारेगा तो राम का अवश्य दर्शन होगा। एक दिन मैंने और ये बात कही थी, कल ही कही थी शायदः-

दैवाधीनं जगत सर्वं  मन्त्राधीनं तु देवता।
ते मन्त्रा ब्राह्मणाधीनास्तस्मात् ब्राह्मणदेवता।।

मन्त्र की इतनी जाप की आवश्यकता क्यों हो जाती है? मन्त्र सिद्ध किसे कहते हैं? मन्त्र कैसे सिद्ध होता है? इसकी जब लोग प्रक्रिया जान लेंगे, तो मन्त्र सिद्ध होगा। हम किसी किसी को देखते हैं कि सचमुच मन्त्र सिद्ध होता है, तो वह कैसे होता है? होता ये है कि मन्त्र को जपते जपते उसका वह मन्त्र प्राण में बैठ जाता है। जब वह मन्त्र प्राण में बैठ जायेगा तो वह अपनी गति को स्वयं पकड़ लेता है। और जिन किसी को चाहे लाख, चाहे करोड़ जाप करने पर थोड़ा बैठ जाता है, उसे मन्त्र की सिद्धि कहते हैं। लेकिन योगी उस मन्त्र के दो भाग को मानते हैं, उसे जानते हैं।

श्रुति एक उदाहरण देती है कि मन पिता है, वाक् स्त्री है, प्राण पुत्र है और चक्षु श्रोत्र इत्यादि धन है। क्या होता है? मन को जब मन्त्र में योग किया जाता है, तब उसकी प्राणिक गति का भान होता है। वह उस प्राणिक गति में प्रवेश करता है। तब अन्तर के चक्षु खुलते हैं, तब नादध्वनि का श्रवण होता है। तब जाकर के कहा जायेगा कि इस मन्त्र की सिद्धि हुई। इस बात को जो प्राणिक योगी होता है, जो प्राणोपासक होता है, वह इस मन्त्र की इस गति को जानता है। मन्त्र के दो भाग होते हैं, योगी अपनी शक्ति से उस मन्त्र को दो भाग में करते हैं। और उसमें मन को प्रवेश कराते हैं। यह जो प्राणिक क्रिया है, यह जो वैदिक क्रिया है वह आजकल लुप्त प्राय हो गई है। और लोगों को हजार हजार बार, लाख लाख बार, करोड़ करोड़ बार जप करने के बाद किसी किसी को ही सिद्धि हो पाती है। इसमें बहुत सी अनुष्ठानिक विधियाँ सब होती हैं, बहुत सा अनुष्ठान करना पड़ता है, लेकिन जो प्राणिक योगी हैं, जिनके बारे में कहा गया है किः-
प्राणो ह्येश यः सर्वभूतैर्विभाति
विजानन् विद्वान् भवते नातिवादी।
आत्मक्रीड़ आत्मरतिः क्रियावा-
नेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः।
यह प्राण ही जो है, वह सर्वभूतों में प्रकाशित हो रहा है। जो विद्वान इसे जानता है, वह अतिवदन नहीं करता है। जो बोलेगा, वही होगा। वही आत्मा में क्रीड़ा करने वाला, आत्मा में रति करने वाला है। ऐसा जो ब्रह्म को जानने वाला है, क्रियावान योगी है, वह ब्रह्मविदों में वरिष्ठ है। इसलिये क्रिया के द्वारा जो मन्त्र का जाप होगा, यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन 12 साल तक आठ घण्टा तक किसी मन्त्र का जाप कर लेने पर जो फल पाएगा, उसी मन्त्र का क्रिया के द्वारा करने पर 1 दिन में 8 घण्टा में प्राप्त हो जायेगा। यही कारण था कि हमारे यहाँ के जो पहले के ऋषि लोग थे, वह समस्त विद्याओं के ज्ञाता होते थे। सब वस्तुओं का ज्ञान होता था।

‘मातृ सदन’ में मातृ सदन का माने ही है मुख्य प्राण। मातृ सदन की जो पत्रिका आप पढ़ेंगे उसमें पहले ही हम मातृ सदन के बारे में बहुत बोल चुके हैं कि मातृ मतलब माँ। और मातृ सदन की माँ कौन है, वही मुख्य प्राण ही मातृ सदन की माँ है। जो उस मुख्य प्राण में प्रवेश करता है, उस मुख्य प्राण में वास करता है, वह मुख्य प्राण में रहता है। वह कहीं भी रहेगा, तो वह मातृ सदन में रहेगा। तो आज तो हम लोगों को व्यवधान बहुत हुआ। पहले हम बहिर्गत बात ही ज्यादा करते थे, आज से हम योगस्थ, आत्मस्थ वैदिक बातों की चर्चा किया करेंगे। ताकि आपलोग धीरे धीरे कम से कम सुनते सुनते यह समझ जायें कि यदि हम सही अर्थ में तत्त्व को जानना चाहते हैं, सही अर्थ में ब्रह्म को पाना चाहते हैं, तो वह कौन सी क्रिया होगी, जिसके द्वारा हम उस ब्रह्म को पायेंगे। भर दिन राम राम राम कहते रहे और भर दिन कहने के बाद भी हमारी मनोवृत्तियों में कोई अन्तर नहीं हुआ, हमारे काम करने में कोई अन्तर नहीं पड़ा, हमारे व्यवहार में कोई अन्तर नहीं पड़ा, तो सब व्यर्थ है। तो जब यौगिक विधि से लोग क्रिया करेंगे तो योग, कर्म, हवन इत्यादि जो विधियाँ सब हैं, जो हमारे वैदिक ग्रन्थों में वर्णित हैं वे स्पष्ट होंगे। हमलोग एक एक करके इन विषयो पर चर्चा करेंगे।
ऊँ ऽ ऽ ऽ
पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
ऊँ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।।

{महाकुम्भ प्रयाग 2001 में दिनांक 22/01/2001 को दिया गया व्याख्यान}
{मातृ सदन से प्रकाशित पुस्तक ग्रन्थमाला-1, ‘वैश्विक अशान्ति का समाधान: अध्यात्म’ के पृष्ट संख्या 207-215}
*इस विषय पर “ग्रन्थमाला 5 ‘ मातृ सदन की साधना वैदिक प्राणोपासना ‘ नामक किताब प्रकाशित हो चूका है|

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