योग का वास्तविक स्वरुप
आजकल योग पर बहुत चर्चाएं हो रही है | परन्तु योग के वास्तविक स्वरुप से अनभिज्ञ कुछ आसन व् शारीरिक क्रियाओं को योग का दर्जा दे देना, एक ऐसी परिस्थिति उत्पन्न कर रहा है, जिससे आने वाले समय में लोग भारतीय मनीषियों के द्वारा अपनाये जानेवाले योग को प्रायः भूल ही जायेंगे | योग शब्द युज् धातु से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ जोड़ना होता है| इसलिए ईश्वर से प्रेम मार्ग का अवलम्बन कर एकीभूत होने का नाम भक्तियोग, निष्काम कर्म का अवलम्बन कर, अन्तःकरण को शुद्ध कर ईश्वर की ओर बढ़ने का नाम कर्मयोग, विशुद्धअंतःकरण, संयतमन वाले प्रबुद्ध व्यक्ति आत्मा का अन्वेषण करने के लिए जिस औपनिषदिक मार्ग का अवलम्बन करते हैं वह ज्ञानयोग है | इसी तरह किसी मार्ग का अवलम्बन करने के लिए शरीर को एक विशेष प्रकार से कुछ देर तक व्यवस्थित कर स्वस्थ रखने की विद्या हठयोग है| परन्तु जिसे रूढ़ में योग कहा जाता है वह पतंजलि योगसूत्र पर आधारित योग ही है | जिसके आदि प्रणेता हिरण्यगर्भ हैं |

अतः हठयोग और सही योग (पातंजल योग) में अंतर समझना अति आवश्यक है| श्रृष्टि के नियंता ने इस श्रृष्टि का निर्माण एक क्रमिक ढंग से किया | अनेक जीव हैं, और प्रत्येक जीव की एक विशेषता है जिससे उसकी स्थिति बनी हुई है| साथ ही उसकी एक सीमा भी है| हठयोग का अधिकांश आसन इन्ही विभिन्न जीवों के बैठने का एक विशेष खासियत को अपना लेना है| उदाहरण के तौर पर मयूरासन – यह आसन मयूर के रूप का है | इसी स्थिति के कारण मयूर छोटे सांप व् छिपकली तक को खाकर पचा लेता है| मनुष्य इस आसन को करने से अपनी पाचन शक्ति बढ़ाता है परन्तु यह भी ध्यान देना होगा कि मयूर के आसन का नक़ल कर हम उसके पाचन शक्ति वाले गुण को लेने के साथ ही उसका जो मानसिक जड़त्व है उसे भी स्वीकारना होगा | इसी तरह गोमुखासन, भुजंगासन, शलभासन(टिड्डी) मतस्येन्द्रासन, वृश्चिकासन, उष्ट्रासन (ऊँट), सिंहासन, वकासन, गरुड़ासन, कुक्कुटासन आदि | इसके साथ ही सबका मिश्रण कर अनेक आसन|

अब जब मनुष्य इनका अनुशरण करेगा तो निश्चय ही उसकी विशेषता को पायेगा साथ ही साथ सिक्के की दूसरे पहलु की भांति उसकी जड़ता भी स्वीकारना होगा.
यही कारण है कि मनुष्य के ऊर्ध्वगमन का मार्ग भी अवरुद्ध हो जायेगा | प्रकृति के जड़त्व के पार जाकर आध्यात्मिक चिंतन करना है तो इसके लिए अपरिग्रह के गुण का होना जरुरी है | आज इस हठयोग को ही योग का दर्जा देने वाले व्यक्ति पतंजलि योग के अपरिग्रह के विपरीत पूर्ण परिग्रही हो गए हैं और इस योग का भी व्यवसायीकरण कर लिए हैं | पहले योगी का निर्माण कन्दरा में होता है तो आज वातानुकूलित कक्ष में | आजकल तो हठयोग के आसन के अलावा व्यायाम को भी योग के श्रेणी में रख दिया गया है|
वेद समस्त ज्ञान की जननी है | छान्दोग्योपनिषद में एक दृष्टान्त आया है | एक समय इन्द्र और विरोचन दोनों ब्रह्मज्ञान के लिए प्रजापति के पास गए | प्रजापति ने ३२ साल ब्रह्मचर्यपूर्वक वास कराने के पश्चात अपने स्वरुप को जल के शकोरे में देखने के लिए कहा तथा प्रजापति ने पूछा कि तुम क्या देखते हो तो उन्होंने कहा कि हम अपने समस्त आत्मा को लोम और नख पर्यन्त ज्यों का त्यों देखते हैं | उन दोनों से पुनः प्रजापति ने कहा कि तुम अच्छी तरह अलंकृत होकर, सुंदर वस्त्र पहनकर और परिष्कृत होकर जल के शिकोरे में देखो | तब उन्होंने ऐसा होकर जल के शिकोरे में देखा | प्रजापति ने पूछा तुम क्या देखते हो | उन्होंने कहा भगवन् जिस प्रकार हम उत्तम प्रकार से अलंकृत, सुंदर वस्त्र पहने व् परिष्कृत हैं वैसा ही यह भी है | प्रजापति ने कहा यही आत्मा है, यह अमृत है और अभय है और यही ब्रह्म है | इस पर दोनों शांतचित होकर लौट गए |

विरोचन शांतचित होकर असुरों के पास पहुंचा और उनको यह आत्म विद्या सुनाई : इस लोक में शरीर ही पूजनीय है, यही सेवनिया है, इसकी ही पूजा-परिचर्या करनेवाला पुरुष इहलोक और परलोक दोनों लोको को प्राप्त कर लेता है | यह संस्कृति असुरों की है |
परन्तु इद्र देवता के पास पहुँचने से पहले विवेचना करने लगे कि यह शरीर ब्रह्म नहीं हो सकता है क्योंकि इस शरीर को सुसज्जित व् अलंकृत करने पर वह प्रतिरूप भी वैसा ही हो गया | उसी तरह इसके अँधा होने पर व् खंडित व् स्त्राम् होने पर वह भी वैसा ही हो जायेगा तथा शरीर के नाश होने पर वह भी नाश हो जायेगा | तथा इन्द्र पुनः प्रजापति के पास लौटकर आये तथा विभिन्न अवस्था में पहले स्वप्नातर्गत फिर सुषुप्तान्तर्गत और अंत में सही आत्म तत्त्व की अनुभूति की | ८/ ७ – १२

ठीक उसी तरह हठयोग के कुछ आसन को अपनाकर उसी विरोचन के धर्म का अनुसरणकर, लोग आसुरीवृत्ति का अवलम्बन कर त्याग, तपस्या, अपरिग्रह तथा संतोष आदि का परित्याग कर, शरीर पोषक धर्म का ही अवलम्बन कर, योग के वास्तविक तत्व से अनभिज्ञ, “अन्धेनैवनियमाना यथान्धाः” की भांति पूरे विश्व में विरोचन के धर्म का पालन करवा रहे हैं. |

तव वास्तविक योग क्या है? इसका ज्ञान कैसे होगा? इसे यहाँ ज्यादा तो नहीं कहा जा सकता संक्षेप में केवल परिचय करने की चेष्टा कर रहा हूँ |
योग के प्रणेता हिरण्यगर्भ हैं तथा इसको पतंजलि ने योगसूत्र में संकलित किया है | इसका पहला ही सूत्र : योगश्चितिवृत्ति निरोधः” है अर्थात चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है | यह पूर्णतः आंतरिक क्रियाएँ हैं | इसी का कुछ अंश बौद्ध धर्म में विपश्यना के रूप में आया है|
इस योग के चार अध्याय हैं १- समाधिपाद २- साधनपाद ३- विभूतिपाद ४- कैवल्य पाद

समाधिपाद उच्चश्रेणी के साधक के लिए है जो पूर्ण वैराग्य को धारण कर लिया है तथा उसे अपनी मानसिक वृत्तियों को ही नियंत्रित करना है | वृत्तियों का शोधन करने से उसकी प्रज्ञा ऋतम्भरा यानि सत्य को धारण करने वाली होगी उसे निर्वीज समाधि की प्राप्ति होगी |

साधनपाद : यह साधारण साधक के लिए है तथा इसी में अष्टांग योग आता है: यम, नियम,आसन . प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा और समाधि | यम और नियम वह आधार है जिस पर यह योगशास्त्र अवलम्बित है इसमें एक का भी आभाव इसे करने की पात्रता से वंचित करता है |
यम : अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह (संग्रह का आभाव)
नियम : शौच, संतोष, स्वाध्याय, तप, ईश्वर प्रणिधान, उसके बाद आसन आता है और आसान के लिए एक सूत्र है स्थिरसुखमासनम्; छाती, कंठ और कपाल को एक सीध में रखकर सुखपूर्वक बैठने का नाम आसन है.| इसके हठयोग के केवल पद्मासन और सुखासन ही आएगा |
उसके बाद प्राणायाम आता है परन्तु प्राणायाम हठ से नाक दबाकर नहीं किया जाता है सूत्र इतना ही कहती है कि तस्मिंसति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः || ४९ साधनपाद ||

इसके बाद धारणा ध्यान व् समाधि ये सब का रूप योगशात्र में तो सूत्रात्मक है परन्तु वह वेद ओर उपनिषन्द में विस्तृत से है जिसे मातृ सदन के तपस्वी संत निगमानंद ने अपनी प्राणोपासना के कुछ लेखों में इंगित किया है|
यह सब बड़ा गहन है इसे कुछ शब्दों में कहना बड़ा ही मुश्किल है|
इसके बाद सिद्धियों का दौड़ चलता है जिसे विभूतिपाद में दिखाया गया है परन्तु साधक इन सिद्धियों के आकर्षण से अपने आपको विलग रखता है तो उसके बाद कैवल्यपाद आता है |
उसके अंतमें पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चित्तशत्तेरिति || ३४ कैवल्यपाद ||

जिनके पुरुषार्थ यानि कर्त्तव्य शेष नहीं रहा, गुणों का अपने कारण में लीन हो गया वह कैवल्य है या द्रष्टा का अपने स्वरुप में प्रतिष्ठित हो जाना कैवल्य है |
हमने अति संक्षिप्त में दिखाने की चेष्टा की है कि योग क्या है? आज की पीढ़ी इस तथाकथित योग में असली योग को न भूल जाये इसलिए जिन्हे सही अर्थ में कैवल्य प्राप्ति या फिर आत्मतत्व का बोध की कामना हो वे कृपया इस भ्र्मजाल से निकलने की चेष्टा करें | पातंजल योग के साधक के लिए तो व्याधि नष्ट करने का दो ही तरीका दिया गया है
१- तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः || समाधिपाद ३२ || उसको दूर करने के लिए एक तत्त्व का अभ्यास करना चाहिए |

२- मैत्री करुणामुदितोपेक्षाणां सुख -दुःख पुण्यापुण्य -विषयाणां भावनातश्चित प्रसादनम् | समाधिपाद 33 || सुखी दुखी पुण्यात्मा और पापात्मा उनके प्रति क्रमशः मित्रता, दया, प्रसन्नता व् उपेक्षा की भवन से चिट स्वच्छ हो जाता है | योग के साधक के लिए तो इस हठयोग की उतनी आवश्यकता भी नहीं है

अतः इस भौतिकवाद की अंधी दौड़ में कहीं आत्मतत्त्व का निरूपण करने वाली सही योग से लोग विमुख न हो जाएँ इसकी आवश्यकता है तथा विद्वतजन इस बात का ख्याल रखें कि यह जो योग के नाम पर पूरे विश्व में नाटक किया जा रहा है वह न तो योगियों के द्वारा है ओर नो ही यह वास्तविक योग को निरूपित करता है।

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