नवरात्र साधना

                                                                                                                                                                           नवरात्र साधना                                                        
                                                  ॐ   s  s  s 
                                 पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते  |
                                 पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते  ||
                                       ॐ शान्तिःशान्तिः शान्तिः 
        नवरात्र में नौ दिनों में शक्ति की नौरूपों की क्रमशः उपासना का विधान है| 
                              प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी |
                             तृतीयं चन्द्रघण्टेति, कूष्माण्डेति चतुर्थकम ||
                             पञ्चमं स्कन्दमातेति, षष्ठं कात्यायनीति  च | 
                             सप्तमं कालरात्रीति, महागौरीति चाष्टमम् || 
                             नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः परिकीर्तिताः |
 
प्रथमं शैलपुत्री:- संसार की भोगेच्छा का प्रबल आवरण पत्थर के सदृश कठोर है | जब साधना  की  शुरुआत होती है तो उस पत्थर को भेदकर जिस शक्ति का उदय होता है वह शैलपुत्री है, जो नवरात्र की प्रथम दिन की साधना है?
 
द्वितीयं ब्रह्मचारिणी:- जब संसार की भोगेच्छा में अनित्यता का बोध हो गया तो जो दूसरी शक्ति है वह ब्रह्मचर्य व्रत में व्रती होना है और उस शक्ति का उदय, प्राकट्य ही दूसरी दुर्गा की शक्ति ब्रह्मचारिणी है| 
 
तृतीयं चन्द्रघण्टेति:-संसार की भोगेच्छा से निवृत हो ब्रह्मचर्यव्रत में व्रती होने के बाद जो अंदर व् बाहर एक अद्भुत शक्ति का उदय होता है वह दूर दूर तक घंटे की आवाज की तरह सन्देश देता है कि एक दिव्य शक्ति का उदय हो रहा है, उसी शक्ति को चंद्रघंटा यानि मनरुपी चन्द्रमा के भीतर की कमजोर आवाज को नादरूपी घंटा के चोट करके नष्ट करना|  
 
कूष्माण्डेति चतुर्थकम्:- संसार की भोगेच्छा की समाप्ति ब्रह्मचर्य व्रत में व्रती, मन की कमजोर आवाज को ब्रह्मचर्य के प्रबल आवाज से दूर करने के बाद अध्यात्मरुपी गर्भ का धारण ही कुष्मांडा शक्ति का प्राकट्य है|
 
पंचमं स्कन्दमातेति:- आध्यात्मिक गर्भ धारण करने के बाद दैविक पुत्र को जन्म देनेवाली शक्ति ही स्कंदमाता है| समस्त इन्द्रिय रूपी देवता जो विषय रूपी असुरों के द्वारा परास्त कर दिए गए थे उनके सेनापति के रूप में प्रकट होना|
 
षष्ठं कात्यायनी:-इन समस्त बाधाओं के बाद जिस शक्ति का उदय होता है वह ऋषि पुत्री के रूप में विख्यात होती है| उसके बाद ही मानव में ऋषि की शक्ति का प्राकट्य होता है|
 
सप्तमं कालरात्रीति:-संसार के समस्त दुर्गुण व भोग  का नाश होने, ऋषि की शक्ति के बाद और परमसिद्धि के पूर्व जो एक रिक्तता है  वह अंधकार ही कालरात्रि है| उसके बाद शिवरुपी गुरु की कृपा से साधक परमगति की ओर बढ़ता है|
 
महागौरी:-शिवरुपी गुरु की कृपा से रात्रि की अन्धकार रुपी कालिमा हटकर पूर्ण शुद्धतारुपी गौरीरूप प्राप्त होना ही महागौरी शक्ति का उदय है|
 
नवमं सिद्धिदात्री:-उसके बाद नवम शक्ति सिद्धिदात्री शक्ति का उदय होकर जीव कृतार्थ हो जाता है|
यही नवरात्र की साधना है|
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