Letter to Hon’ble Judge

MS/2K14/Hdr/10 24-01-2014

प्रेषित योगेश गुप्ता जी,

                                माननीय अपर जिला जज, जिला एवं सत्र न्यायालय,

                                देहरादून-248001.

                                 

विषय : आपके न्यायालय में अंतिम आदेश हेतु पेंडिंग क्रिमिनल रिवीजन संख्या 1022012 के सम्बन्ध में कुछ गम्भीर अतिमहत्त्वपूर्ण तथ्य।

 

श्रीमान जी,

1.            मातृ सदन एक दिव्य आध्यातिमक संस्था है जो पर्यावरण संरक्षण और भ्रष्टाचार उन्मूलन को कृत्संकल्पित है, से आप भली-भाँति परिचित हैं। अपने इसी उद्देश्यद्वय की पूर्ति हेतु और कोर्इ मार्ग शेष न बचता देख मातृ सदन के सन्त संविधान सम्मत सबसे शांतिपूर्ण  मार्ग सत्याग्रह अविचिछन्न अनशन का अवलम्बन करते रहे हैं। मातृ सदन के सन्त ब्रह्रालीन स्वामी निगमानन्द सरस्वती जी कर्इ बार लम्बे समय तक सफल पूर्वक अनशन कर चुके थे। उनके द्वारा वर्ष 2011 में किया गया अनशन भी गंगा रक्षा हेतु शुरु हुआ था परन्तु भ्रष्ट नेताओं, संगठनों और संस्थानों के भ्रष्ट अधिकारियों ने माफियाओं के साथ एकीभूत होकर एक बृहद षडयन्त्र के तहत उनको आश्रम से चिकित्सीय जाँचदेखरेख के नाम पर अस्पाताल ले जाकर जहर दिलवाकर उनकी हत्या करवा दी। मातृ सदन ने सत्याग्रह कर सीबीआर्इ जाँच गठित करवार्इ परन्तु सीबीआर्इ की जाँच टीम को हत्यारों/माफियाओं ने खरीद लिया और सीबीआर्इ ने सत्य को दबाने के लिये केस में न केवल क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की बलिक जब हमने इसका विरोध किया तो एक विपक्षी की तरह इसे स्वीकार करवाने हेतु अपनी पूरी ताकत ही नहीं झोंकी बल्कि सीबीआर्इ के तत्कालीन अधिवक्ता श्री दीपनारायण जी ने माननीय (मजिस्ट्रेट) के कक्ष में बैठकर क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार करने सम्बन्धी आदेश लिखा/लिखवाया। मातृ सदन ने उक्त आदेश के विरुद्ध दण्ड निगरानी संख्या 1022012 माननीय जिला एवं सत्र न्यायालय देहरादून के न्यायालय में योजित की और माननीय उच्च न्यायालय उत्तराखण्ड के निर्देश के बाद इसे माननीय जिला जज महोदय ने आपके न्यायालय में स्थानान्तरित किया।

2.            मातृ सदन जिस शुद्धता और पवित्रता में वास करती है इसकी कल्पना कोर्इ शुद्ध और पवित्र व्यक्ति  ही कर सकता है और यही कारण है कि दैव संयोग से राज्य के बाहर के एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने जब मामले की सत्यता और प्रमाणों को देखा तो बिना किसी शुल्क के इस केस में अपनी सेवा देने की हार्दिक इच्छा व्यक्त की। तमाम सारे कन्डोलेन्स/स्थगन, अन्य नो-वर्क इत्यादि के पश्चात दिनांक 17.07.2013 से बहस की शुरुआत हो गर्इ। प्रारंभिक बहस सुनने के बाद कानूनी पहलुओं को दरकिनार करते हुए आपने हमें व सीबीआर्इ दोनों को यह कहा कि मामला जहर से हत्या होने अथवा न होने की है अत: निगरानी की केन्द्र बिन्दु भी यही है और मेडिकल ग्राउन्ड पर कोर्ट सन्तुष्ट होगी तो अग्रिम जाँच (Further Investigation) होगा। हमें व सीबीआर्इ दोनों को इसी बिन्दु पर बहस को ध्यान केन्द्रित करने को कहा गया। इसी क्रम में सीबीआर्इ के अधिवक्ता द्वारा कहा गया कि जाँच की बारीकियों से वे भिज्ञ नहीं है अत: जाँच अधिकारी आइ ओ को बुला लिया जाये। आपने कहा कि कोर्ट इस स्टेज में जाँच अधिकारी को नहीं बुला सकती है और कोर्ट को तो वे (सीबीआर्इ के अधिवक्ता) ही बता दें इस पर भी सीबीआर्इ के अधिवक्ता ने बताया कि नहीं ये मामला उनके समझ में नहीं आ रहा है और जाँच अधिकारी ही बता पायेंगे। निश्चित तिथि पर जाँच अधिकारी, सीबीआर्इ में पुलिस उपाधीक्षक श्री वी दिक्षित जी, उपस्थित हुए और उन्होंने क्लोजर रिपोर्ट की बातें बतार्इ। हमारे द्वारा क्लोजर रिपोर्ट की बातों का तथ्यात्मक व तर्कसंगत ढंग से खण्डन कर माननीय न्यायालय के समक्ष प्रमाणों सहित सत्य प्रस्तुत किया गया। तत्पश्चात आपने माननीय न्यायालय ने हमें व सीबीआर्इ दोनों को कुछ बिन्दुओं जैसे कि सभी अस्पतालों के पैथोलोजिकल टेस्ट, दी गर्इ दवार्इयाँ, अस्पताल में भर्ती रहने की अवधि के दौरान हुए इलाज व संभावनायें इत्यादि के रिकार्डों को लेकर उपसिथत होने को कहा और आपने पुन: दोहराया कि कोर्ट मेडिकल बिन्दु पर सन्तुष्ट हो जायेगी तो अग्रिम जाँच (Further Investigation) का आदेश होगा।

3.            दिनांक 30.09.2013 को हमारे परमादरणीय श्री गुरुदेव भी माननीय न्यायालय को एसिस्ट करने के लिये हमारे साथ न्यायालय परिसर में मौजूद थे। सीबीआर्इ के अधिवक्ता सहित जाँच अधिकारी भी मौजूद थे। उस दिन दौरान-ए-बहस जाँच अधिकारी के पास हमारे किसी भी बिन्दु का उत्तर नहीं था। स्वयं आपने भी मेडिकल रिकार्ड में बहुत सा फर्जीवाड़ा पकड़ा था जिसका आइ ओ के पास कोर्इ उत्तर नहीं था। आप मेडिकल बिन्दु पर पूर्ण सन्तुष्ट हो गये और आपने सीबीाआर्इ के अधिवक्ता से पूछा कि वे बतायें कि Further Investigation क्यों नहीं होना चाहिये? सीबीआर्इ के अधिवक्ता इसका कोर्इ जवाब नहीं दे पाये और आपने कहा कि ठीक है! आपकी (सीबीआर्इ) बहस बन्द की जाती है। इसके पश्चात् आपने कहा कि आप मेडिकल बिन्दु पर सन्तुष्ट हैं अब कानूनी पहलू (माननीय न्यायालयों की रूलिंग) को देख लेते हैं इस पर हमलोगों के द्वारा कहा गया कि इसके लिये हम अपने     अधिवक्ता को बुला लेते हैं। आपने कहा कि हम अपने अधिवक्ता से पूछकर तिथि लेने हेतु आवेदन दे दें हमने ऐसा ही किया। परन्तु इसी दिन आइ ओ ने एक विवरण माननीय न्यायालय के समक्ष प्र्रस्तुत किया जिसकी प्रति हमें नहीं देने की बात कही परन्तु माननीय न्यायालय के कानूनी प्रक्रिया का संज्ञान कराने पर हमें उसकी प्रति दी गर्इ। उक्त विवरण में आ इ ओ ने एक मेडिसिन के बारे बिल्कुल ही झूठी बातें लिखी हैं। साथ ही साथ स्वामी निगमानन्द जी के दून अस्पताल में ले जाने की समय के बारे में भी कोर्इ जानकारी नहीं दी गर्इ और दून अस्पताल में हुए र्इलाज का ब्यौरा भी नहीं दिया गया। न्यायहित में मेडिसिन सम्बन्धी झूठी जानकारियों को न्यायालय के रिकार्ड में लाना आवश्यक था। इसी उदेश्य  से हमने एक निवेदन माननीय न्यायालय के समक्ष दिनांक 04-10-2013 को प्रस्तुत की और माननीय न्यायालय से निवेदन किया कि इस बात को रिकार्ड में रखा जाये। उक्त निवेदन की छायाप्रति संलग्न-1 के रुप में संलग्न है।

4.            अगली तिथि 18.10.2013 को हमारे अधिवक्ता कानूनी बिन्दुओं को माननीय न्यायालय के समक्ष पस्तुत करने को हाजिर हुए तो सीबीआर्इ के अधिवक्ता ने हमारे उपरोक्त आवेदन की जवाब दाखिल करने की बात कही और पुन: तिथि तो ली गर्इ सीबीआर्इ के अधिवक्ता द्वारा परन्तु चुँकि हमारे अधिवक्ता बाहर से आते हैं अत: निश्चित तिथि हेतु हमें ही आवेदन देने को कहा गया और हमने ऐसा ही किया।

5.            अग्रिम तिथि दिनांक 15112013 को भी सीबीआर्इ अधिवक्ता के द्वारा जवाब दाखिल नहीं किया गया। इस तिथि को हमारे संग हमारे परमादरणीय श्री गुरुदेव भी माननीय न्यायालय के समक्ष थे और हमलोगों ने माननीय न्यायालय को दिनांक 30.09.2013 को हुर्इ बहस और मौखिक आदेश का संज्ञान कराया माननीय न्यायालय ने अंतिम अवसर कहते हुए सीबीआर्इ को एक सप्ताह के अन्दर जवाब दाखिल कर देने को कहा और यह भी कहा कि एक सप्ताह के बाद कोर्इ जवाब दाखिल करने की छूट नहीं दी जायेगी। इसी दिन सीबीआर्इ के अधिवक्ता को कहा गया कि आप तो हमारी सहायता (हत्यारों को सजा दिलाने) के लिये नियुक्त हुए हैं तो आप क्यों विरोध कर रहे हैं? इस पर उनका (श्री पंकज गुप्ता जी) ये कहना कि देखते हैं Further Investigation होगा तब ना, और इस पर आपका चुप हो जाना हमलोगों के अन्दर एक बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह(?) खड़ा कर दिया लेकिन न्यायिक गरिमा के मद्देनजर हम सबकुछ देखते रहे। पुन: अग्रिम तिथि हेतु आपने हमें ही आवेदन देने को कहा और हमने ऐसा ही किया। सात दिन बाद भी सीबीआर्इ के अधिवक्ता ने कोर्इ जवाब दाखिल नहीं किया जिसे हमने माननीय न्यायालय के समक्ष अपना निवेदन दिनांक 25.11.2013 के रुप में दर्ज कराते हुए अग्रिम तिथि पर कानूनी पहलू की बहस समाप्त कर न्यायहित मेंअंतिम आदेश पारित करने का अनुरोध किया। संलग्नक-2।

6.            अग्रिम तिथि पर भी सीबीआर्इ के अधिवक्ता ने आई ओ को बुलाने की बात कही और आापने बड़े ही आसानी से स्वीकार करते हुए हर बार की तरह इस बार भी अग्रिम तिथि लेने के लिये हमें ही आवेदन लिखने को कहा। हमने आपके कहे अनुसार ही आवेदन लिखा और दिनांक 21-01-2014 तिथि तय की गर्इ।

7.            दिनांक 21.01.2014 को माननीय न्यायालय में पहुँचने पर पर पता चला कि आप छुटटी पर हैं और हमें पुन: फरवरी की तिथि लेने के लिये कहा गया। परन्तु हमने निवेदन किया कि माननीय न्यायालय ने ही 21 जनवरी 2014 की तिथि निश्चित की थी और बहस भी पूरी है केवल कानूनी पहलू पर रूलिंग देनी है इसलिये कृपया जब आप पीठासीन अधिकारी छुटटी से वापस आ जायें तो आपके समक्ष प्रस्ततु किया जाये परन्तु सीबीआर्इ के अधिवक्ता श्री पंकज गुप्ता जी के द्वारा अब न्याय के सभी मर्यादाओं को ताकपर रखकर बिना वजह हमारे निवेदन का विरोध किया जाता रहा। अन्तत: माननीय इन्चार्ज जज महाशय ने आपके पेशकार महोदया से पूछकर कि आप कब आयेंगे दिनांक 23-01-2014 की तिथि मुकर्रर कर दी।

7.            दिनांक 23.01.2014 को आपके हाव-भाव और पुन: सीबीआर्इ के अधिवक्ता श्री पंकज गुप्ता जी का व्यवहार हमारे सामने बहुत प्रश्नचिन्ह(?) खड़ा कर रहा था। जब हमने सत्य बात माननीय न्यायालय के समक्ष रखी कि सीबीआर्इ अधिवक्ता इस केस में निर्णय नहीं होने देना चाहते हैं तो श्री पंकज गुप्ता जी का ये कहना कि हम ही तिथि के लिये आवेदन देते रहे हैं, पुन: हमारे सामने एक बहुत बड़़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा कर रहा है क्योंकि हमारे अधिवक्ता राज्य से बाहर से आते हैं और आप ही कहते रहे हैं कि उनसे पूछकर डेट के लिये आवेदन दे दीजिये और हम तदनुकूल ही करते रहे हैं। महशय यहाँ एक वेद मन्त्र का उद्धरण आवश्यक जान पड़ता है जो इस प्रकार है:-

                                                चत्वारि वाक परिमिता पदानि तानि विदुब्र्राह्राणा ये मनीषण:।

                                                गुहा त्रीणि निहिता नेग् यनित तुरीयं वाचो मनुष्य वदनित।।

                                                                                                                                                (ऋगवेद 116445,  अथर्ववेद 91027)

(अर्थात वाणी की चार अवस्था है परा, पश्चान्ति, मध्यमा और वैखरी। इसमें से जो बाहर निकलकर आता है वह केवल वैखरी है और तीन मनुष्य के अन्दर ही रह जाता है परन्तु हमारे जो मनीषी हैं वह उन तीनों को वैखरी से ही समझ जाते हैं।)

                हमने श्री पंकज गुप्ता जी को कहा कि आप extra न बोलकर कानून सम्मत बात बोलिये तो उनका आपे से बाहर होकर हमको यह कहना कि वे अब हमसे कानून सीखेंगे, पुन: किसी बहुत बड़े षडयन्त्र का आभास करा रहा है। श्री पंकज गुप्ता जी की बात शायद आपको भी खराब लगी और हमारे द्वारा किसी जवाब दिये जाने से पहले ही आपने उनकी तरफ देखकर ये सब नहीं करने का निर्देश दिया। ऐसे में हमारे अधिवक्ता और हमने माननीय न्यायालय की गरिमा को अक्षुण्ण रखते हुए वाद सबूत माननीय सर्वोच्च न्यायालयों के छ: निर्णयों की प्रति माननीय न्यायालय में वाद सबूत जमा देकर माननीय न्यायालय को अपने Further Investigation का मौखिक आदेश का याद दिलाकर न्यायालय कक्ष से बाहर आ जाना ही उचित समझा।

8.            विदित हो कि श्री पंकज गुप्ता जी ने पूर्व में माननीय न्यायालय कक्ष में माननीय न्यायाधीश के समक्ष ही हमारे परमादरणीय श्री गुरुदेव को न केवल तुम कहकर सम्बोधित किया था बल्कि परमादरणीय श्री गुरुदेव के यह कहने पर कि वे (परमादरणीय श्री गुरुदेव) एक साधु हैं, कहा था कि वे (श्री पंकज गुप्ता जी) उससे बड़े साधु हैं। यह श्री पंकज गुप्ता जी के सोच को बता रहा था।    

9.            माननीय! हमारे द्वारा अनौपचारिक रुप से आपके समक्ष यह बात भी आ चुकी है कि हत्यारों ने सीबीआर्इ को 10 करोड़ रुपया इस केस को दबाने के लिये दिया है। 10 करोड़ का यह ठेका ठीक उसी प्रकार का है जिस प्रकार नारायण सार्इं के केस में 14 करोड़ का ठेका हुआ है। हम 10 करोड़ की राषि का प्रमाण तो नहीं दे सकते हैं परन्तु रुपया दिया गया है इसको साबित करने के लिये हमारे पास प्रचुरमात्रा में प्रमाण हैं।

                यह सब तथ्य प्रमाणस्वरुप इसलिये रखा जा रहा है क्योंकि ‘शब्द आकाश का धर्म है और इसे जब तक पृथ्वी पर उतारा नहीं जाता है तब तक प्रतिष्ठित नहीं होता है और आकाश में उत्पन्न होकर अन्तरिक्ष में ही विलीन हो जाता है। इसलिये इन तमाम तथ्यों/सत्य को रिकार्ड में रखा जा रहा है ताकि यह पुन: आकाश में विलीन न हो जाये।

                             सम्मान सहित।

                              भवदीय,                                                                            

 (ब्रह्राचारी दयानन्द)

 मातृ सदन, हरिद्वार।

 

संलग्नक : यथोक्त 1 व 2।       

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