शक्ति की अवहेलना से कुपित हुए शिव ! कैसे होंगे शान्त?

दिनांक 16.06.2013 को रात 07:18 मिनट पर उत्तराखण्ड श्रीनगर

कलियासौड़ सिथत सिद्धपीठ माँ धारी देवी को उठाया गया। शिव और शक्ति

अभिन्न हैं। सभी जानते हैं कि जब माता सती ने शिव की अवमानना से व्यथित

होकर यज्ञकुण्ड में अपना शरीर अग्नि को समर्पित कर दिया था तो शिव व्याकुल

होकर उनके पार्थिव शरीर के साथ त्रिभुवन में विचरने लगे थे। अर्थात शिव और शक्ति

दोनों अभिन्न हैं। माँ धारीदेवी को अपने मूल स्थान से उठाकर शक्ति अवमानना

की गर्इ और इस जघन्य कृत्य से शिव कुपित हो गये। यही कारण है

कि इधर रात 07:18 मिनट पर माँ धारीदेवी को उठाया गया और उधर एक घण्टा

बाद शिव की नगरी केदारनाथ में लगभग आठ बजे पहला कहर बरसा। उस पर

भी शिवशक्ति अवमानना करने वाले नहीं चेते तो अगले सुबह पुन: केदारनाथ में

जो सैलाब आया उसकी कल्पनामात्र से लोगों का दिल दहल उठता है और वर्षो

तक दहलता रहेगा। भगवान शिव, जो कल्याणकारी है, कुपित हुए और रौद्र रुप

धारण कर उन्होंने केदारनाथ धाम को शमशान स्थल बना दिया।

किसी समस्या का कारण ढूँढ़ा जाता है तभी उसका समाधान होता है। यहाँ

पर शिव के कोप का कारण शक्ति की अवमानना है इसलिये जब तक शक्ति माँ

धारीदेवी, को पुन: उनके मूल स्थल पर विधि-विधान से प्रतिष्ठित नहीं किया

जायेगा तब तक देवाधिदेव महादेव भगवान शिव के कोप को शान्त करने की कोर्इ

भी चेष्टा पुन: किसी अनर्थ का कारण हो सकती है। शक्ति को प्रतिष्ठित किये

बिना भगवान शिव को शान्त करने की चेष्टा से पुन: होने वाले अनर्थ का

जिम्मेदार कौन होगा?

यह तो एक तात्कालिक कारण हुआ जो शिव इस प्रकार कुपित हुए।

हमलोग एक साल पीछे की घटना का स्मरण करें जब मातृ सदन में तपस्यारत

स्वामी ज्ञानस्वरुप सानन्द जी (पूर्वाश्रम नाम प्रोफेसर जी.डी.अग्रवाल) ने कहा था

कि गंगा जी की दुर्दशा को देखते हुए यात्रियों को चारधाम यात्रा स्वत: ही रोक

देनी चाहिये। इस बात पर बहुत बवाल हुआ था और इसका भारी विरोध हुआ

जिसमें धार्मिकवस्त्रों से अलंकृत बहुत से लोग भी शामिल थे। अब जब देवभूमि के

देवताओं ने स्वयं ही चारधामयात्रा रोक दी है तो वे लोग चुप क्यों हैं?

स्वार्थ और भोग में रहने वालों की दृष्टि बहुत संकीर्ण हो जाती है और यही

समस्या का जड़ है। परन्तु योगी-ऋषि-मुनि और सन्तगण अपनी तपस्या के बल

से दूर की बात बहुत पहले देख लिया करते हैं।

मीडिया भी मातृ सदन के विचारों को अक्षरशः नहीं रख रही है। मातृ सदन

किसी के विचार पर कोर्इ टीका टिप्पणी किये बगैर साफ-साफ शब्दों में अपना

मत प्रगट कर रही है कि यदि माँधारी देवी को पुन: उनके मूल स्थान पर

प्रतिष्ठित नहीं किया जाता है और गंगा पर निर्माणाधीन और प्रस्तावित सभी बाँधों

को समाप्त नहीं किया जाता है तथा निर्मित बाँधों से 60 प्रतिशत जल तत्काल

नहीं छोड़ा जाता है तो शिव का कोप शान्त होना असम्भव है और उत्तराखण्ड

मात्र तीन जिलों (हरिद्वार, देहरादून और उधमसिंहनगर) का होकर रह जायेगा।Image

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